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भारतीय सिनेमा

भारतीय सिनेमा 
भारतीय सिनेमा के सौ  साल 

भारतीय सिनेमा ने सौ  साल का अपना सुहाना सफ़र  पूरा कर लिया है।  भारत के सबसे पहली फिल्म 3 मई 1913 को भारतीय फिल्म जगत के पितामह माने  जाने वाले दादा साहब फाल्के द्वारा बनी फिल्म 'राजा हरिश्चन्द्र 'प्रदर्शित हुई थी।  इसी फिल्म ने ही भारतीय फिल्म की नींव रखी थी। आरंभिक दस वर्षों  में केवल 91 फिल्में  ही बनी थी। वर्तमान में फिल्म उद्योग का चेहरा पूरी तरह से बदल गया है। अब तो हरसाल लगभग 1000 से ज्यादा फिल्मों  का निर्माण होता है।
पहले के समय में महिलाओं  का फिल्मों  में काम करना बुरा माना जाता था। जब राजा हरिश्चंद फिल्म बनी तो महिला कलाकार की समस्या आई। किसी भी अच्छे परिवार में महिला का काम करना असंभव  था। सालुंके नाम के वेटर ने इस समस्या का समाधान किया ये वेटर स्त्री जैसे लगता था इसलिए तारामती नाम के पात्र को निभाने के लिए इस वेटर को रखा लिया गया। राजा हरिशचंद्र की भूमिका दत्तत्रेय ने की दूसरी महिला पात्र के लिए गणपत शिंदे ने भूमिका अदा  की। हरिश्चंद्र के बेटे की भूमिका निभाने के लिए कोई भी अपने बेटे को इस पात्र को निभाने के लिए राजी नहीं हुआ क्योकि इस पात्र की मृत्यु हो जाती है इसलिए फाल्के ने अपने बेटे भालचंद को इस पात्र को निभाने के लिए लिया। इस फिल्म को बनाने के लिए पैसे की समस्या का सामना भी फाल्के ने किया परन्तु फाल्के की पत्नी ने अपने गहने देकर समस्या का समधान  किया। कई कठिनाई के बाद फाल्के ने चार रीलो  में इस फिल्म का निर्माण कर लिया। इस फिल्म को दर्शकों  ने काफ़ी  पसंद किया।
भारतीय सिनेमा के पिछले सौ  वर्षो ने इस सिनेमा जगत में अनेको  उपलब्धि हासिल की। पहले तो मूक फिल्मों  का निर्माण हुआ परन्तु बाद में बोलती फिल्मों  का निर्माण हुआ। आलमआरा भारत की पहली बोलती फिल्म बनी। 14 मार्च 1931 में इसको प्रदर्शित किया।ये फिल्म पारसी रंगमंच के एक लोकप्रिय नाटक पर आधारित थी। इस फिल्म में कोई संगीतकार और गीतकार नहीं था। हारमोनियम,वायलिन  और तबले पर इस फिल्म के गीत डाल  दिए थे। मूक फिल्मों  के निर्णाण  में दिन में ही फिल्म बनती थी परन्तु इसके बाद रात में भी फिल्म निर्माण होने लगा।    इसके बाद बोलती फिल्मों  का दौर  शुरू हुआ।
बीते  वर्षों  में भारतीय सिनमा ने फिल्मो का अर्थ ही बदल दिया। प्रेम कहानियों के बाद भारतीय समाज की छवि और समस्या से लोगो को रूबरू कराया। ये भी कहा जा सकता है की आधुनिक सिनेमा भारतीय समाज का दर्पण है। जहाँ  एक और भारतीय समाज पर कटाक्ष किया है दूसरी और सशक्त जीवन के लिए प्रेणना का स्रोत बनी है। हमारे समाज पर भारतीय सिनेमा का प्रभाव रहा है इसलिए कहानी लेखन में भारतीय समाज की समस्या पर बनी कहानियाँ  ज्यादा लोकप्रिय हुई है।
भारतीय सिनेमा से लोगों  का खूब मनोरंजन हुआ है। दर्शक फिल्म की कहानी ,गानों ,और फिल्म अदाकारों के लटके झटके से कुछ समय की लिए सही अपनी समस्या को भूल जाते है और मनोरजंन  करके तरोताजा हो  कर आते  है। बीते  कुछ वर्षों में फिल्म की कुछ कहानियां ऐसी भी आई जो की केवल सस्ता मनोरंजन और खराब मनोवृति का कारण  भी रही है पर इसके साथ सिनेमा जगत में अनेकों  सफ़ल  प्रयोग हुए है। फिल्म की कहानियाँ किसी बड़ी हस्ती के जीवन पर या किसी बड़ी घटना पर लिखी गयी जिन्हे लोगों  ने बहुत पसंद किया।
बीती समय में फिल्मों  में मेककप  का जादू भी चला। मेकअप द्वारा किसी जवान कलाकार को बूढ़ा  दिखाया या मेकअप द्वारा स्पाइडर मैन  के  किरदार  में लोगों  को आश्चर्य चकित कर दिया।  बीते  वर्षो में मेकअप की गुणवत्ता में बहुत सुधर आया है।
सिनेमा की बीते  वर्षो में फिल्म के चित्रण पर ही बहुत काम हुआ है। फिल्म निरमताओ ने फिल्म के चित्रण को स्टूडियो में न दर्शा कर वास्तविक पृष्भूमि पर चित्रित किया है। फिल्म के चित्रों के लिया निर्माता और कलाकार काफी मेहनत करते है जैसे यदि सूरज के उगने के साथ कोई गीत फिल्माना है तो इसके लिए कलाकार और निर्माता सुबह अंधरे में काम शुरू कर देते है इसके लिए सर्दी या गर्मी की भी चिंता नहीं करते है।  हमारी सिनेमा में देश विदेश के अनेको चित्र मन को मोह लेते है।
बीते  बर्षो में सिनेमा के संगीत के भी अनेको प्रयोग मिसाल बन गए  है। गीतों के रागों और तालों  के साथ का नया नया अनूठा प्रयोग में तारीफे काबिल है।  हमारे संगीतकारों ने संगीत के आवशकता के अनुसार सुर और ताल का अनूठो संगम और नए  नए प्रयोग नए  नए  चेहरे  के साथ कर रहे है। अब संगीत केवल कुछ लोगो साथ सीमित  नहीं है अब तो आवाज और संगीत द्र्श्यो के मांग के अनुसार होता है।
हमारे हिंदी सिनेमा में अच्छे अच्छे कलाकारों को प्रेरित करने के लिए उनको  अनेको पुरुस्कारों   और उपाधि  से नवाज़ा  जाता है। १९६९ में भारत सरकार ने दादा फाल्के के नाम पर दादा फाल्के पुरस्कार देना शुरू कर दिया जो फिल्म उद्योग में सबसे सर्वोच्च सम्मान मन जाता है।   जिससे कलाकारों में और अच्छा करने के प्रेणना आती है। हमारी फिल्मे देश विदेशो में अपनी गुणवत्ता के कारण पसंद की जाती है और कई भारतीय फिल्मों   को  ऑस्कर जैसे अवार्डों  से नवाज गया है।
आज भारतीय सिनेमा अपने सुनहरे  दौर  में प्रवेश कर चुका  है और हमें ये आशा करनी चाहिए की आगे भी ये सफ़र  यु ही विकास के साथ बढ़ता रहे।

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